जीना इतना आसान नहीं
विपदा जब-जब टकराती है, जीवन को शूल चुभाती है,
हर दुख को पीना पड़ता है, जख्मों को सीना पड़ता है।
अपने भी आँख छिपाते हैं, कुछ लोग तुम्हे भरमाते हैं,
कुछ राय बाँटने वाले हैं, ये विषधर विष के प्याले हैं
शक्ति का इनमें है घमंड़, प्रपंच पुरोधा हैं प्रचंड,
यहां हर कोई है दिग दिगंत, अनृत कृत्य इनके अनंत,
ये पास तुम्हारे आयेंगे, तुम पर आक्षेप लगायेगें,
तुम्हे रोज रोज धिक्कारेंगे, जीवन का पाठ पढ़ायेंगे,
तुम्हे उंच-नीच का ज्ञान नहीं, जीवन जीना आसान नहीं,
ऐसा भी भला कभी होता है?, क्या कउआ कोयल होता है?,
ऐसा कोई प्रबंध करो, अपनी क्षमता का द्वंद करो,
महालक्ष्य कभी न सध पायेगा, तु श्रृंग विजय न कर पायेगा,
जीवन वसंत के दौर में, था जिनका तुमने साथ दिया,
वो साथ छोड़कर जाते हैं, किंचित भी न सकुचाते हैं,
वैसे परार्थ कि सीमा क्या?, करुणा का चाह से लेना क्या?,
पर मन तो चंचल है स्वच्छंद, ये पाले उत्कंठा बेअंत,
जब आस की डोरी टुटती है, भवजाल नेपथ्य मे छुटती है,
साहसविहिन, उर्जाविहिन, उत्साहविहिन मन हो जाता है,
हे शूरवीर न घबराओ, तुम सुर्यतेज मुख पर लाओ,
ये कर्कट इनका काम यही, जो ये बोले बस वही सही,
अपनी क्षमता का ध्यान करो, निज आसय का संधान करो,
तुम हो अनंत तुम में वसंत, तुम पंच भूत का वास हो,
तुम अविभार्व तुम तिरोभाव, तुम पर्वत में कैलाश हो,
तुम सिंह दहाड़, तुम गज प्रहार, तुम बहती गंगा धारा हो,
तुम गंधराज तुम तुम चंद्रकांत, तुम सागर का किनारा हो,
हे उठो वीर संधर्ष करो, कि युगपरिवर्तन आन है,
सुख-दुख मानो दिन और रात, ये विधि का विधान है,
